कभी-कभी मैं कहता हूँ कि विचारों की तेज़ दौड़ उतनी बीमारी पैदा नहीं करती, जितनी बीमारी आधे-अधूरे रूप में लगातार दौड़ते रहने की लत से जन्म लेती है। सामान्यतः मान लीजिए कि हम शारीरिक रूप से एक ही दिशा में दौड़ रहे हैं। अब क्योंकि हमें दौड़ने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए हम रुक नहीं पा रहे, धीरे-धीरे चल नहीं पा रहे। किसी से कहो कि ज़रा धीमे चलो, या स्लो मोशन में चलो—स्लो मोशन में चलना सबसे कठिन कार्य है। तेज़ चलना आसान है।
अब मान लो कोई तेज़ चल रहा है, भाग रहा है—शरीर भी भाग रहा है, मन भी भाग रहा है। अगर उससे कहा जाए कि ज़िगज़ैग दौड़ो—थोड़ा इधर, फिर उधर, फिर उधर—तो कुछ ही समय में उसका मानसिक संतुलन समाप्त हो जाएगा। वह कन्फ्यूज़ हो जाएगा। लेकिन यदि आप एक ही दिशा में लगातार दौड़ते रहें, तो अंततः कभी न कभी ज्ञान प्राप्त होने की संभावना रहती है। पर यदि दौड़ ज़िगज़ैग हो, दिशा बार-बार बदली जाए, तो ज्ञान कभी प्राप्त नहीं होगा और मानसिक क्षमता टूट जाएगी। परिणामस्वरूप व्यक्ति परेशान हो जाएगा।
यही बात मन की क्रियाओं पर भी लागू होती है। मन जब किसी एक विषय पर लगातार चलता है, तो स्थिति अलग होती है। लेकिन आज मन में कितने “शॉर्ट्स” चल रहे हैं—जैसे आप फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम या यूट्यूब पर 30-30 सेकंड या एक मिनट के शॉर्ट्स देखते हैं। ये तो बाहर के शॉर्ट्स हैं। ज़रा सोचिए, मन के भीतर कितने छोटे-छोटे शॉर्ट्स लगातार चल रहे हैं। जो एक मिनट का शॉर्ट आप बाहर देखते हैं, उसे मन तीन-चार सेकंड में ही पूरा कर लेता है। तीन-चार सेकंड में एक शॉट पूरा, फिर दूसरा, फिर तीसरा।
अब सोचिए—आधे मिनट में, एक मिनट में, दस मिनट में—कितने शॉट्स मन के भीतर चल जाते हैं। इस प्रक्रिया में दिमाग कितना थक रहा है। यदि किसी को एंग्ज़ायटी है, तो उसके भीतर कितने शॉर्ट्स चल रहे होंगे—छोटे-छोटे डर, छोटे-छोटे विचार, और उनसे बनी हुई कितनी कहानियाँ। आप उन्हें आपस में लिंक भी करते जाते हैं—“अगर मैं मर गया तो क्या होगा?”, “मेरे बच्चों का क्या होगा?”, “मेरे माता-पिता का क्या होगा?”, “मेरी पत्नी कहाँ जाएगी?”, “कहीं वह कुछ और तो नहीं कर लेगी?”—इस तरह इतने शॉर्ट्स विकसित होते जाते हैं कि व्यक्ति स्वयं को भय की अवस्था में डाल लेता है।
अब इसके विपरीत, मान लीजिए आप मन में एक लंबी कहानी चलाते हैं। मन तेज़ ही सही, लेकिन एक ही लंबी स्टोरी बना रहा है। उस स्टोरी को छोड़िए मत, बदलिए मत, स्विच मत कीजिए, ट्रैक मत बदलिए। मन उसी कहानी में बार-बार दौड़ेगा, लेकिन उसी में लगा रहेगा। आपको शॉर्ट्स नहीं बनाने हैं, आपको एक लंबी स्टोरी की स्क्रिप्ट विकसित करनी है।
यहाँ एक और समस्या सामने आती है। मन शॉर्ट्स बनाने का आदी हो चुका है, लंबी कहानी बनाने का नहीं। एक सामान्य व्यक्ति को शॉर्ट्स की लत होती है, लंबी सोच की नहीं। लंबी स्टोरी बनाने में समय लगता है। इसके लिए शरीर को स्थिर रहना पड़ता है, इंद्रियों को कुछ हद तक शांत करना पड़ता है। आपको एक जगह रुकना पड़ता है। फिर उस सोच को स्मृति में फीड करने के लिए काग़ज़-कलम या कंप्यूटर की आवश्यकता पड़ती है।
जैसे ही आप लंबी स्टोरी या लंबी स्क्रिप्ट बनाने की इच्छा के साथ काम शुरू करते हैं, वैसे ही आपको धीमा होना पड़ता है। शुरुआत में भले ही तेज़ हों, लेकिन जैसे ही उस सोच को व्यवहारिक रूप देने लगते हैं, आपको स्लो होना ही पड़ता है। और अगर आप पहले से ही थके हुए हैं, तो कई लोग उसी तेज़ी को बनाए रखने के लिए दवाओं या किसी न किसी सब्सटेंस का सहारा लेते हैं। इसलिए आप देखेंगे कि कई स्क्रिप्ट राइटर या क्रिएटिव लोग लंबे समय तक काम करने के लिए कुछ न कुछ लेते हैं। बहुत कम लोग होते हैं जो बिना किसी सब्सटेंस के शांत रहकर काम कर पाते हैं। उन्हें अपनी कला की समझ होती है—कब रुकना है, कब पॉज़ लेना है।
इसलिए मैं कहता हूँ—मन को दौड़ाइए, लेकिन एक दिशा में दौड़ाइए। बिना गुरु के भी आप ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। किंतु यदि आप ज़िगज़ैग दौड़ेंगे, बार-बार स्विच करेंगे, और मन के भीतर शॉर्ट्स बनाने की आदत में फँसेंगे, तो समस्या बढ़ेगी। ध्यान दीजिए—दिन भर मन में शॉर्ट्स बनते रहते हैं, रात में भी। सपनों में भी शॉर्ट्स ही बनते हैं। कोई भी दस मिनट का सपना नहीं देखता।
अब सवाल यह है कि जब मन लगातार शॉर्ट्स बना रहा है, तो उसकी डायवर्जन कहाँ है? यदि शॉर्ट्स बंद हो जाएँ, तो मन रेस्टिंग में चला जाएगा। लेकिन आप क्या करते हैं—मन में चल रहे शॉर्ट्स को रोकने के लिए बाहर कोई और शॉर्ट देख लेते हैं, ताकि मन डाइवर्ट हो जाए और पहले वाला थका हुआ ब्रेन थोड़ा रिलैक्स हो जाए। फिर दूसरे से थकान होने लगती है।
असल में यह समाधान नहीं है, यह सिर्फ़ डायवर्जन है। इसलिए अंततः ध्यान इसी पर देना है कि आपको किस ओर जाना है—अंतिम लक्ष्य रेस्टिंग है।
मेंटल रेस्टिंग।
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