विधि, लाभ, हानि और योगिक दृष्टि
कार्यक्रम में सम्मिलित विषय—
एकाग्रता क्या है? एकाग्रता में मन -ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय की भूमिका ।
सामान्य लोग एकाग्रता कैसे करते हैं ।
गलत एकाग्रता के दुष्परिणाम । अज्ञानतावश किए गए एकाग्रता से होने वाली हानियाँ व रोग ।
मन मस्तिष्क और देह पर प्रभाव
एकाग्रता के प्रकार ।
एकाग्रता कब लाभदायक है?
प्राणायाम और ध्यान से सही संतुलन कैसे बने?
प्राणायाम और एकाग्रता ।
ध्यान की कई विधियों का प्रयोग ।
एकाग्रता का अर्थ है—मन का किसी एक विषय पर टिक जाना। लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म अंतर समझाना ज़रूरी है मन के द्वारा किसी भी विषय पर जबरन एकाग्रता की जा रही है अथवा स्वाभाविक एकाग्रता ।
मन जब स्वाभाविक रूप से टिकता है → यह संतुलित एकाग्रता है । इसमें मन के द्वारा इंद्रियों और देह पर किया क्या सत्प्रभाव और दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं ।
मन जब जबरदस्ती टिकाया जाता है → यह तनावपूर्ण एकाग्रता है । इसमें मन के द्वारा देह और इंद्रियों पर क्या क्या सदाबहार और दुष्प्रभाव पद सकते अहीन । इस पर गंभीर और व्यावहारिक चर्चा करेंगे । उन प्रयोगों की भी चर्चाएं होनी चाहिए जिसका व्यवहार जगत में मेरे द्वारा प्रयोग हुआ है ।
यहाँ पर यह भी समझना बहुत आवश्यक है कि एकाग्रता होने के बाद क्या मन को किसी विषय से इक्षापूर्वक उस विषय से वापस लाया जा रहा है अथवा नहीं । मन को उस एकाग्र विषय से किसी दूसरे विषय पर शिफ्ट किया जा रहा है अथवा मन को विषय रहित किया जा रहा है । अर्थात् मन को उस कार्य से हटा कर शून्य कर दिया जा रहा है । ज्यादातर मन किसी एक विषय में लगने के बाद ईक्षानुसार वाहन से हैट नहीं पाता है । इसे ही समझने के लिए इस वर्कशॉप का आयोजन किया जा रहा है ।
एकाग्रता कैसे किया जाए -
ज्यादातर व्यक्ति इस विषय पर जीवन भर ध्यान नहीं देते हैं । चूँकि एकाग्रता का संबंध उस वर्तमान वातावरण से भी होता है जो उसके परिवार में बचन से घट रहा होता है । अर्थात् वातावरण , उसका अपना लक्ष्य , उसकी अपनी आंतरिक क्षमता , इत्यादि अनेकों ऐसे तत्व हैं जो एकाग्रता के बढ़ने में सहायक हो सकते हैं किंतु मैं इसके लिए दार्शनिक और आध्यात्मिक पक्ष चुनता हूँ जिसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया ।
एकाग्रता में कर्तापन पर महत्व कितना दिया जाये । मन किसके द्वारा संचालित हो रहा है । उसे इन्द्रियों को कैसे एकाग्रता के लिए उपयोग किया जाना चाहिए । कर्मेन्द्रियों का उपयोग कैसे किया जाना चाहिए । ये सभी ध्यान की पद्दति का सिखाया जाएगा । और साथ साथ ऐसे कई प्राणायाम है जिसके माध्यम से भी एकाग्रता का अभ्यास सिखाया जाएगा ।
एकाग्रता हेतु प्राणायाम के तीन स्तर का अभ्यास करवाया जाएगा : -
1-रेचन प्रधान विधि
2-पूरक प्रधान विधि
3-कुंभक प्रधान विधि
4- ध्यान विधि जिसमें इंद्रियों (आँख) की एकाग्रता) , त्राटक , चक्र ध्यान , मन्त्र ध्यान तथा दृष्टा-दृश्य भेद ध्यान ।
एकाग्रता और स्वास्थ्य
मन का एक ही विषय पर लगातार अटके रहने का अर्थ ही है कि उसके देह और इन्द्रियों पर प्रभाव । वह अच्छा भी हो सकता है और नकारात्मक भी हो सकता है । यह निर्भर करता है उसके एकाग्रता के तरीके पर । उसके द्वार एकाग्रता के लिए उपयोग किए गए उन इन्द्रियों , देह और मस्तिष्क के सूक्ष्म अंगों । और साथ साथ मन के कितनी समझ से के द्वारा उस विषय पर एकाग्रता करता अहि । यदि एकाग्रता के पूर्व उसकी मानसिक और दार्शनिक स्थिति बिल्कुल साफ़ है तो एकाग्रता का लाभ सर्वाधिक होता है । उसके हानि नहीं हो सकती अहि । इन्ही इडलियों को बताने का प्रयास किया जाएगा ।
मेरे अनुभव में एकाग्रता की कमी से उतने रोग नहीं होते जितने गलत एकाग्रता के अभ्यास से।
जैसे गलत एकाग्रता के परिणाम:
1-ओवरथिंकिंग, सिर का हमेशा भरी रहना, नींद का आना बंद होना, नींद में स्वप्न ही आते रहना ।
2-चिंता (Anxiety), अवसाद, अज्ञात भय, कहीं न कहीं दर्द का अनुभव करते रहना, पेट में तनाव ।
3-चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग्स , डायग्राम , पेट के ऊपरी हिस्से में खिंचाव ।
4-मानसिक थकावट, BP, थाइरोइड असंतुलन,
5-उदान वायु , अपान वायु समान वायु का असंतुलन । जिसमें कब्ज़, IBS इत्यादि अनेक असंतुलन ।
सही एकाग्रता: जहाँ मन सहजता से टिके और उतनी ही सहजता से हट भी सके
अगर मन टिके लेकिन हट न सके → समस्या
अगर मन हटता रहे और टिके नहीं → समस्या
संतुलन = टिकना + छोड़ना +यही तो अभ्यास के द्वारा सीखना है ।
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