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नाभि सिद्धांत (Teacher Training Course)

कोर्स का मूल विषय:  नाभि सिद्धांत,   धरण,   नाभि का हटना,  ऊर्जा का केंद्र,  सूर्य सिद्धांत, समान वायु,   नाभि=लिवर, नाभि=आँत,   नाभि=ऊर्जा, नाभि=किडनी,   नाभि=माइग्रेन,  नाभि=मस्तिष्क से सम्बंधित परेशानी ।

अर्थ: “वात् इति गत्यर्थः” — वात का अर्थ वायु व हवा नहीं, गति का सिद्धांत है। जहाँ गति है, वहीं प्रकृति की अभिव्यक्ति है; इसी कारण भारतीय चिंतन में वात को पाँचों वायुओं की जननी कहा गया। किंतु ऋषि-दृष्टि यहीं नहीं रुकती। वह यह भी उद्घाटित करती है कि गति स्वयं स्थिरता से ही जन्म लेती है। गति, स्थिरता का निषेध नहीं, स्थिरता, गति की जननी है । 

इसी ज्ञानात्मक बोध से देह के मध्य—नाभि क्षेत्र—को समान वायु का स्थान कहा गया। समान का तात्पर्य है वह बिंदु जहाँ गति लुप्त है, जहाँ वायु होते हुए भी उसमें प्रवाह नहीं रहता अर्थात् वह समान व सम है । यह मध्य क्षेत्र स्थिरता का प्रतीक है, जो समस्त देह-गति को संतुलित और संचालित करता है। अन्य सभी  प्राण,अपान, उदान और व्यान जननी समान वायु ही है—जो स्वयं गतिविहीन है।अर्थात् यह सिद्ध है कि गति के पीछे एक ऐसा बिंदु है जो गतिविहीन है  । 

इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि गति का वास्तविक केंद्र एक पूर्ण स्थिर बिंदु है। योग में इसे समान वायु कहा गया, वेद और वास्तु में यही नाभि क्षेत्र,  ब्रह्म स्थान है—वह आधार जिस पर संपूर्ण देह-रचना स्थित है, किंतु जिस पर कोई भार नहीं पड़ता। केंद्र स्वयं निर्भार है; गति केवल परिधि में घटित होती है।

योग-परंपरा इसी केंद्र को मणिपुर चक्र कहती है—मणियों का भंडार। यह भंडार स्थिरता का है, और इसी स्थिरता से जीवन की समस्त गति छुपी हुई होती है। अतः नाभि को समान वायु, ब्रह्म स्थान और मणिपुर—तीनों नामों से जाना गया, क्योंकि यह देह का वह केंद्र है जो स्वयं अचल रहते हुए सम्पूर्ण चलन को सम्भव बनाता है।

यही गूढ़ सत्य है कि शक्ति और ऊर्जा का स्रोत गति में नहीं, गतिहीनता में है। इसी कारण ब्रह्म स्थान को अग्नि और ऊर्जा का मूल कहा गया। यही वह प्रथम तत्व है जो गर्भ में प्रकट होता है—और यहीं से जीवन की समस्त गतियाँ संचालित होती हैं।

धरण 

धरण का शाब्दिक अर्थ है आधार देना अथवा बाँधना, इसे गांवों में धन्नी के नाम से भी जाना जाता था जिसका प्रयोग छप्पर व कच्ची छत के नीचे एक मोटी लकड़ी को सहारे के रूप में प्रयोग में लाया जाता था । उसी प्रकार इस देह भवन (गति व वायु) में भी नाभि (स्थिरता) एक ऐसा बिंदु है जो पूरे देह का आधार है ।  इसका मूल अर्थ है—शरीर में एक ऐसा स्थान है जो स्थिर है, गति विहीन है, अर्थात् समस्त गति के पीछे गतिविहीन तव ही कार्य करती है । इसे ही मूलतः गुरुत्वाकर्षण के नाम से भी जाना जाता है ।   


नाभि: ऊर्जा का केंद्र

यह सिद्ध है कि जो कुछ भी चलायमान या ऊर्जामय (वायु) प्रतीत होता है, उसके पीछे गति का सिद्धांत ही कार्यरत है। और उस गति के सिद्धांत के मूल में स्थिरता—अपरिवर्तनशीलता—निहित है। इसी कारण नाभि (मणिपुर), जिसे मणियों का पुर कहा गया है और जो ऊर्जा का मूल केंद्र है, सूर्य के नाम से भी जाना जाता है। यह जीवन का आधार स्तंभ और धुरी है, जो देह रूपी घर की छत को नीचे गिरने से बचाए रखता है।

इसे और गहनता से देखा जाए तो यह स्थिर बिंदु और गति का सिद्धांत देह रूपी घर के सभी अंगों को स्वाभाविक ऊर्जा प्रदान करता है तथा उनके संचालन में आने वाली बाधाओं को समाप्त करता है। भोजन के उचित और संतुलित पाचन तथा निष्कासन से मस्तिष्क को निरंतर पूर्ण पोषण और ऊर्जा प्राप्त होती रहती है। जब मस्तिष्क को भौतिक पोषण उपलब्ध रहता है, तब चिंतन की प्रक्रिया के माध्यम से मानसिक और आध्यात्मिक उत्थान संभव होता है।

नाभि व धरण का हट जाना  

नाभि के हटने से संबंधित एक प्रचलित धारणा यह है कि नाभि के मध्य कोई स्थान होता है, जो अपने मूल स्थान से खिसक जाता है। इस प्रकार की अभिव्यक्ति से यह भ्रम उत्पन्न होता है कि नाभि कोई भौतिक अंग है, जो स्थानांतरित हो जाता है। इसी कारण यह विषय आधुनिक विज्ञान की दृष्टि में महत्वहीन मान लिया गया।

किन्तु मेरे अपने साधनात्मक अनुभव में, यहाँ गति और गति के पीछे स्थित स्थिरता तथा गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पूर्णतः लागू होता है—जो न केवल तर्कसंगत है, बल्कि अनुभवसिद्ध भी है। मैं इसे प्रकृति का एक मूल केंद्र अनुभव करता हूँ, जिसकी व्याख्या इस कोर्स में विस्तार से की जाएगी।

यह सिद्ध है कि नाभि प्रकृति का एक मूल स्थिर बिंदु है—जहाँ कोई गति नहीं होती, अर्थात् जहाँ वायु सम अवस्था में रहती है, जिसे योग में समान वायु कहा गया है। यदि इस सम अवस्था के विषम होने के कारणों को देखा जाए, तो स्पष्ट होता है कि इस गुरुत्वाकर्षण केंद्र के असंतुलन का मूल कारण स्वयं पुरुष है।

यहाँ पुरुष से तात्पर्य उस “मैं” से है, जो देह का अनुचित और असजग उपयोग करता है। इसी अज्ञानपूर्ण उपयोग से नाभि का मूल क्षेत्र विषम हो जाता है।

आंतरिक कारण : मानसिक तनाव

चिंतनशील और अत्यधिक चिंताशील स्वभाव वाले लोग प्रायः पेट के मध्य और ऊपरी भाग को अनजाने में भीतर की ओर खींचे रखते हैं। बहुत से लोगों में सोचते समय या किसी एक बिंदु पर एकाग्र होने के दौरान इंद्रियों में तीव्र खिंचाव उत्पन्न हो जाता है। अज्ञानवश इस खिंचाव को देह में स्थायी बना देने से पेट की मांसपेशियाँ निरंतर तनाव में रहने लगती हैं। परिणामस्वरूप नाभि और धारण का क्षेत्र सदा खिंचाव की अवस्था में बना रहता है। जब मस्तिष्क में खींचने का यह स्वभाव स्थायी हो जाता है, तो वही प्रवृत्ति पूरे उदर क्षेत्र को प्रभावित करती है, और यहीं से नाभि से संबंधित समस्याओं का आरंभ होता है।

बाह्य कारण : शारीरिक असंतुलन और आहार

भारी वजन उठाना, पैरों का असंतुलित रूप से ऊपर-नीचे होना, अथवा अत्यधिक भोजन करने की आदत—ये सभी नाभि केंद्र के संतुलन को प्रभावित करते हैं। भोजन की गुणवत्ता में निरंतर कमी रखना, जिससे कब्ज़ और अपच जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, नाभि केंद्र को और अधिक अस्थिर कर देती हैं।

अति भोजन करने वाले व्यक्तियों में नाभि के ऊपरी भाग, अर्थात् डायफ़्राम, में अत्यधिक तनाव बना रहता है, जिससे नाभि केंद्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसी प्रकार वे लोग, जिनका कार्य शरीर की मांसपेशियों को उभारने से जुड़ा होता है—जैसे खेलकूद या फ़िल्म जगत से जुड़े लोग—अक्सर पेट को जानबूझकर भीतर दबाए रखते हैं। यह आदत धीरे-धीरे नाभि क्षेत्र पर गहरा दुष्प्रभाव डालती है।

“जहाँ गति (सम) स्थिर है, वहाँ विकार का होना संभव नहीं” 

योगी अनूप 


नाभि सिद्धांत:Teacher Training Course

Content Hours: 12 hour(s)
Fee: 11000/-
Duration : 4 Days
From 2026-03-07 To 2026-03-15

Copyright - by Yogi Anoop Academy