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वायु का अति-बनना और रुकना

6 days ago By Yogi Anoop

वायु का अति-बनना और रुकना: असली कारण क्या है

अक्सर लोग यह शिकायत करते हैं कि उनके पेट में गैस बनती है, लेकिन आसानी से बाहर नहीं निकलती। रुक जाती है। रुकने पर पेट में जकड़न तो होती ही है, साथ-साथ दिमाग़ में खिंचाव भी बढ़ जाता है। सामान्यतः इसका मूल कारण ग़लत भोजन ही माना जाता है। उनका मानना यह होता है कि भोजन में अति या ग़लत भोजन से वायु का निर्माण अत्यधिक होता है और उसके कारण देह के पाचन और निष्कासन वाले अंगों में वायु का दबाव बन जाता है। वे सभी अंग उस वायु के दबाव को निष्क्रिय नहीं कर पाते हैं।

यदि इस कारण को सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो बहुत हद तक सही है, किंतु मैं उन व्यक्तियों की बात कर रहा हूँ जो न तो भोजन में अति करते हैं और न ही किसी प्रकार की भोजन में ग़लतियाँ करते हैं, अर्थात् सादा भोजन करते हैं। यदि इस प्रकार के लोगों में वायु का निर्माण और उसका दबाव बढ़ रहा है, तो उसका मूल कारण क्या होगा?

खोज यहाँ इस तथ्य की है कि इस प्रकार के लोगों में वायु के विकार की समस्या का मूल कारण भला क्या हो सकता है।

मेरी अपनी व्यावहारिक और ध्यानात्मक खोज में इसका मूल कारण मानसिक ही है—मन की वह ऐच्छिक प्रक्रिया, जो ज्यादातर समय अप्रत्यक्ष रूप से पेट को खींचने में लगी रहती है। अर्थात् मन पेट में लगातार खिंचाव बनाए रखता है, किंतु यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि उस व्यक्ति को इस बात का ज्ञान अथवा अनुभव ही नहीं होता कि उसने स्वयं अपने पेट के अंगों को खींच रखा है। यदि इसी खिंचाव के रहते कोई व्यक्ति भोजन करता है, तो उसके पेट में पाचन और निष्कासन की प्रक्रिया का असामान्य होना स्वाभाविक है। यही असामान्य प्रक्रिया ही वायु का अत्यधिक निर्माण करती है, और चूँकि पेट में मन के द्वारा खिंचाव निरंतर बना हुआ है, तो अंग वायु को बाहर निकलने नहीं देते हैं।

मेरे पास आने वालों में लगभग 80 फीसदी रोगियों में खान-पान की कोई समस्या न होने के बावजूद भी वायु का अति-विकार देखने को मिलता है। उनके मानसिक जगत का आकलन करने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि वे अपने पेट को निरंतर सिकोड़ने में अभ्यस्त हैं।

यहाँ तक कि डॉक्टर के द्वारा भी उन्हें भौतिक रूप से कोई समस्या न होने का प्रमाण मिल जाता है, और अंत में वह उन्हें अवसाद-चिंता का रोगी क़रार दे देता है। किंतु मेरे अनुभव और खोज में यह अवसाद और चिंता से कहीं अधिक, अप्रत्यक्ष रूप से पेट को सिकोड़ने की बुरी लत है, जिसे वह स्वयं नहीं जान रहा होता है। मैंने अपने प्रयोगों के दौरान यह भी देखा कि इस प्रकार की बुरी मानसिक लत के साथ किया गया भोजन, चाहे जितना अच्छा, सादा और कम हो, वह अंदर पेट में जाकर नुकसान ही करेगा। यहाँ पर नुकसान से तात्पर्य वायु व गैस के अति-निर्माण से है। यद्यपि यह किसी भी रोग का सूचक नहीं है, किंतु उस व्यक्ति के सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त करने में पूरा कार्य करता है। उसका पूरा दिन कार्य करने में मन नहीं लगता। उसकी क्षमता, चाहे वह दैहिक हो या मानसिक, धीरे-धीरे ह्रास होने लगती है।

मैंने अपनी व्यावहारिक खोज में यह भी देखा कि ऐसे असंतुलन वाले लोगों की संख्या सर्वाधिक है। शरीर में रोग न होने के बावजूद इस प्रकार का असंतुलन, रोग से कहीं अधिक असमंजसकारी होता है।

इसीलिए मैंने अपने यौगिक प्रयोगों के दौरान उन विधियों पर ज़ोर देने का प्रयास किया है, जिससे वह अपने पेट को ढीला कर सके। जब वह अपने पेट को योगिक और प्राणायाम की विधियों से ढीला करने का प्रयास करता है, तो यहाँ तक कि उसे उसी पल वायु के निष्कासन में तुरंत सहायता मिल जाती है। यहाँ तक कि प्राणायाम के सिर्फ़ 11 मिनट के अभ्यास में वायु को बहुत आसानी से निष्कासित किया जा सकता है। स्वयं पर भी प्रयोग करके देखा कि जब मुझे यह महसूस होता है कि पेट में या आंतों में वायु नहीं भी है, तब उस प्राणायाम के दौरान पेट को ढीला करने पर तुरंत वायु के निकलने का अनुभव होता है।

इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि गैस व वायु तब तक पेट से बाहर नहीं निकल सकती, जब तक पेट और उससे जुड़े हिस्सों की मांसपेशियाँ ढीली (relaxed) न हों। यहाँ “पेट” से आशय आमाशय और आंतों से है, जो ऊपरी हिस्से (जहाँ से डकार आती है) तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें निचला हिस्सा—आंतों का क्षेत्र (lower abdomen)—भी शामिल है।

यदि आमाशय (stomach), डायफ्राम और पेट की मांसपेशियाँ कसी हुई (tight) रहती हैं, तो पेट से वायु का बाहर निकल पाना संभव ही नहीं है। यहाँ तक कि वायु के अनावश्यक निर्माण में भी रोक नहीं लगाई जा सकती है। यदि उन सभी मांसपेशियों में अनावश्यक तनाव न दिया जाए, तो वायु का अनावश्यक निर्माण संभव ही नहीं है। उसका जीवंत प्रमाण मैं स्वयं हूँ।

मैं यह भी स्वीकार करता हूँ कि इन खिंचावों को व्यक्ति जल्दी समझ नहीं पाता है। वह कहता भी है कि मैं आख़िर अपनी मांसपेशियों को क्यों खींचूँगा! बात यह नहीं कि क्यों खींचूँगा, बात यह है कि मन जब बहुत तीव्रता से भाग रहा होता है, तब वह अपनी ही देह के अंगों को कहीं-न-कहीं खींच रहा होता है। उसी में पेट का हिस्सा भी सम्मिलित हो जाता है। जीवन में हर कार्य क्यों और कैसे पर निर्धारित नहीं होता है । आख़िर व्यक्ति अपने ही नाखून को क्यों काट रहा होता है ! जब कि उसमें कोई स्वाद व मिनरल तो है नहीं । काट कर खाता तो है नहीं फेंक ही देता है । यह सब सिर्फ इसलिए कि उसका मन था तीव्र गति से चल रहा होता है कि उसे धिमकारने के लिए किसी न किसी देह के अंगों को खींच खाँच कर अप्रत्यक्ष रूप से धीमा करना चाह रहा होता है । 

इसीलिए इस खिंचाव (tension) को पहचानना आसान नहीं होता। कई बार इसे समझने में महीनों या वर्षों का समय लग जाता है कि वास्तव में हम ही अपने पेट को अनावश्यक रूप से कसकर रखे हुए हैं।

इसलिए सबसे पहला कदम है—यह जागरूकता विकसित करना कि हमने पेट को खींचकर रखा है। जब यह समझ आ जाती है, तो योगिक अभ्यासों के माध्यम से इसे आसानी से ढीला किया जा सकता है। और वायु विकारों पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है  । 

विशेष रूप से उदर प्राणायाम  (एब्डोमिनल ब्रीदिंग) और डायफ्रामेटिक ब्रीदिंग जैसी तकनीकें पेट की मांसपेशियों को शिथिल करने में अत्यंत प्रभावी होती हैं। इन अभ्यासों के माध्यम से न केवल गैस की समस्या में राहत मिलती है, बल्कि पूरे शरीर और मन को भी आराम मिलता है।


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