Loading...
...

ध्यान में कुछ भी नहीं बदलता !

5 days ago By Yogi Anoop

ध्यान में कुछ भी नहीं बदलता !

     ध्यान के संदर्भ में एक अत्यंत सूक्ष्म और गहन तथ्य है, जिसे समझे बिना साधना प्रायः दिशा खो देती है। सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि ध्यान के द्वारा कुछ बदलेगा—या तो देह में परिवर्तन होगा, या अनुभव करने वाले में। परंतु यदि हम इसे दार्शनिक दृष्टि से देखें, तो स्पष्ट होता है कि न तो देह में कोई वास्तविक परिवर्तन होता है, और न ही देह का अनुभव करने वाले—दृष्टा—में। न दृश्य बदलता है, न दृष्टा; परिवर्तन यदि कहीं घटित होता है, तो वह केवल दृष्टिकोण में, देखने की स्पष्टता में, और बोध की परिपक्वता में।

उपनिषदों की परंपरा में इस सत्य को बार-बार प्रतिपादित किया गया है। बृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया—“द्रष्टा द्रष्टृत्वे न विपरिलोप्यते”—अर्थात् दृष्टा अपने द्रष्टा होने के स्वभाव से कभी विचलित नहीं होता। वह सदा साक्षी ही रहता है। इसी प्रकार कठोपनिषद में नचिकेता को यमराज बताते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है—“न जायते म्रियते वा कदाचित्।” यह जो अपरिवर्तनशील सत्ता है, वही दृष्टा है। यदि उसमें परिवर्तन मान लिया जाए, तो वह नित्य नहीं रह जाती, और तब समस्त अनुभव का आधार ही खंडित हो जाता है।

जब कोई साधक ध्यान में बैठकर किसी वस्तु, बिंदु या श्वास पर एकाग्र होता है और यह अपेक्षा करता है कि उस वस्तु में कोई परिवर्तन हो जाएगा, तो यह एक सूक्ष्म अज्ञान है। भगवद्गीता भी इस भ्रम को तोड़ते हुए कहती है—“प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः”—सारे परिवर्तन प्रकृति में होते हैं, गुणों के स्तर पर होते हैं। दृश्य—जो भी देखा जा रहा है—वह प्रकृति का ही भाग है, और वह अपने नियमों के अनुसार ही परिवर्तित होता है, न कि साधक की एकाग्रता के कारण।

यदि ध्यान में रहते हुए भी यह धारणा बनी रहती है कि बाहरी जगत को बदला जा सकता है, तो यह स्पष्ट संकेत है कि साधक अभी भी बहिर्मुखी है। उसका केंद्र अभी भी बाहर है, और वह दृश्य को साधने का प्रयास कर रहा है। परंतु उपनिषदों की समस्त शिक्षा इसी ओर संकेत करती है कि सत्य की खोज बाहर नहीं, भीतर की ओर है—“पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः”—इंद्रियाँ स्वभावतः बाहर की ओर प्रवाहित होती हैं, इसलिए मनुष्य बाहर को ही देखता रहता है। जो विरले हैं, वे ही अपनी दृष्टि को भीतर की ओर मोड़ते हैं।

अब यदि साधक यह मान ले कि ध्यान के द्वारा वह दृष्टा को ही परिवर्तित कर देगा, तो यह और भी गहरी भ्रांति है। दृष्टा स्वयं परिवर्तन का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि वही तो हर परिवर्तन का साक्षी है। अद्वैत वेदांत में शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा है—“द्रष्टा दृश्यम् विविच्यते”—दृष्टा और दृश्य का विवेक ही मुक्ति का मार्ग है। यदि दृष्टा को भी दृश्य की श्रेणी में रख दिया जाए, तो फिर यह विवेक ही नष्ट हो जाता है।

वास्तव में, यदि दृष्टा में परिवर्तन संभव होता, तो उसे जानने वाला कौन होता? जो भी परिवर्तन ज्ञात होता है, वह दृश्य है। दृष्टा तो वह है जो सब परिवर्तनों को जानता है, पर स्वयं कभी ज्ञेय नहीं बनता। माण्डूक्य उपनिषद में इसी को “तुरीय” कहा गया है—वह अवस्था जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों से परे है, परंतु उन सबकी साक्षी है। वह न बदलती है, न किसी परिवर्तन से प्रभावित होती है।

तो फिर ध्यान में होता क्या है? यदि न दृष्टा बदलता है, न दृश्य, तो साधना का प्रयोजन क्या है? यहाँ एक अत्यंत सूक्ष्म बिंदु है—ध्यान में केवल दृष्टिकोण का परिष्कार होता है। देखने का ढंग बदलता है, और उसी से सम्पूर्ण अनुभव का अर्थ बदल जाता है।

प्रारंभ में दृष्टिकोण अज्ञान से आच्छादित होता है। दृष्टा स्वयं को देह मान लेता है, पंचमहाभूतों—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश—के साथ अपनी पहचान जोड़ लेता है। यही “अहंकार” की जड़ है। तैत्तिरीय उपनिषद में पाँच कोशों का वर्णन करते हुए यही बताया गया है कि मनुष्य अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोशों से परे भी है—वह इन सबसे अलग है। परंतु अज्ञानवश वह स्वयं को इन्हीं में सीमित कर लेता है।

साधना और ध्यान के माध्यम से धीरे-धीरे यह सीमित दृष्टिकोण ढहने लगता है। यह कोई बाहरी परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक आंतरिक स्पष्टता है। जैसे-जैसे एकाग्रता गहराती है, वैसे-वैसे यह बोध प्रकट होता है कि जो कुछ भी देखा जा रहा है—वह “मैं” नहीं हूँ। देह बदलती है, श्वास बदलती है, विचार बदलते हैं, भावनाएँ बदलती हैं—परंतु जो इन सबको देख रहा है, वह अपरिवर्तनशील है।

अंततः यह अनुभव प्रकट होता है कि दृष्टा स्वयं में पूर्ण है—न उसे किसी परिवर्तन की आवश्यकता है, न किसी प्राप्ति की। छांदोग्य उपनिषद का महावाक्य “तत्त्वमसि”—तू वही है—इसी बोध की ओर संकेत करता है। यह कोई बनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि जो पहले से है, उसी का अनावरण है।

इस प्रकार ध्यान का सार किसी परिवर्तन में नहीं, बल्कि पहचान के शुद्धिकरण में है। जहाँ पहले “मैं” देह था, अब स्पष्ट होता है कि “मैं” केवल साक्षी हूँ—शुद्ध चेतना। और यही वह बिंदु है जहाँ बिना कुछ बदले, सब कुछ बदल जाता है।


Recent Blog

Copyright - by Yogi Anoop Academy