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तेज जप से क्या हो सकता है ?

1 week ago By Yogi Anoop

क्या तेज़ जप से मोक्ष मिल सकता है? 

जिस कार्य में मन को विश्राम कम मिलता है और तनाव अधिक, उसमें मन और मस्तिष्क का थकना निश्चित है। थकान से कोई रंग हो अथवा न हो किंतु थकान तो स्वयं में एक रोग है । कई बार मनुष्य बचपन से ही वर्षों तक स्वयं को अविश्रांत अवस्था में रखने की आदत पद जाती है । तब मस्तिष्क और उसकी कोशिकाएँ उसी के अभ्यस्त और आदी हो जाती हैं। किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उससे मोक्ष मिल जाएगा । मोक्ष का अर्थ ही है छोड़ देना। सब कुछ छूट जाना है । जहाँ पकड़ने की मात्रा अधिक है और छोड़ने की कम, वहाँ छोड़ने का अभ्यास हुआ ही नहीं। ध्यान वहाँ तक पहुँचा ही नहीं।

एक उदाहरण लें। एक मिनट में दो सौ बार "राम-राम" शब्द का दोहराव करना, और एक मिनट में सिर्फ 5 बार  करना । दोनों का भेद देखिए। जिसने दो सौ बार किया, उसने इतनी शीघ्रता और हड़बड़ी में किया कि उसका ध्यान केवल करने पर रहा। छोड़ने पर, रुकने पर नहीं रहा। जब कि दोहराव में करना और न करना दोनों सम्मिलित था । क्रिया और अक्रिया दोनों अवस्थाएँ थीं । किंतु उसका मन करने पर ही था , यहाँ तक कि उस न करने के कम से कम पल को अनुभव ही नहीं किया । 

जिसने पाँच दोहराव किया, उसके जप में रुकने की मात्रा बढ़ गई। जब मन का किसी भी स्थान पर रुकने का समय काल बढ़ेगा तभी मन की स्थिरता का बोध होगा । यदि मन शब्दों को पकड़कर बहुत जल्दी जल्दी गतिमान करता रहेगा तो वह तेज गति अर्थात् दो शब्दों के मध्य में अल्पतम रिक्तता का अनुभव करेगा कैसे । मन के द्वारा शब्दों में गति के तेज कर देने से शब्दों के मध्य उस रूकने के स्थान का अनुभव संभव नहीं हो सकता है । यदि उसका उद्देश्य उस गति से बाहर निकलना है , उस गति से परे जाना है तब शब्दों का तेजी से दोहराव करने पर संभव नहीं हो सकता है । यह तो शब्दों के रुकने पर ही संभव होगा क्योंकि मन जब तक चलायमान व गतिमान है तब तक विश्राम की अवस्था व स्थिरता का बोध नहीं कर सकता है । इसका मूल अर्थ तो यही है कि वह परिधि में चक्कर काट रहा है । 

एक अन्य बात जो समझने योग्य है , मन के द्वारा उस पाँच बार के दोहराव में भले ही उसे शब्दों के बाद रुकने व  ठहराव के समय रुकने या छोड़ने का अनुभव ना हो किंतु इसके बावजूद भी मस्तिष्क और इंद्रियों को विश्राम तो मिलेगा ही । जैसे हृदय की गति में जो रेस्टिंग होता है उसका प्रत्यक्ष अनुभव तो नहीं होता है किंतु वह हृदय के गति एक निश्चित संख्या में कम होने पर मन मस्तिष्क और स्वयं हृदय के लिए तो सावस्थ्यकारी है ही । उसी तरह मन को जब किसी भी नाम शब्द आराम आराम से जाप करवाते हैं तब विश्राम का प्रत्यक्ष अनुभव भले ना करे किंतु उसे सूक्ष्म अंगों को आराम और विश्राम तो मिलेगा ही । 

शब्द के दोहराव के पल शब्दों के मध्य रुकने की आदत हो जिसमें निःशब्दता की अनुभूति हो जाये इसी को तो मन का शब्द चक्र से बाहर होना होता है । यदि उसे यह बोध हो जाए कि "राम" शब्द के पश्चात आने वाली वह विश्रामावस्था मोक्ष की झलक है, स्थितप्रज्ञता की झलक है, तो वह उसका अनुभव कर सकेगा। क्योंकि शब्दों में कुछ भी नहीं सिवाय भावों के , शब्द तो मन के द्वारा पैदा किए जाते हैं । 

अब प्रश्न यह है कि नाम-जप का लक्ष्य क्या है। यदि किसी शब्द को दोहराने का मूल उद्देश्य निःशब्द अवस्था में स्थित होना है व शब्दों के पैदा करने वाले की अनुभूति करना है तब तो मेरा सिद्धांत वहाँ लागू होगा। किंतु यदि उद्देश्य उस शब्द के रूप को पाना है, तो वह लागू नहीं होगा। अर्थात् यदि  "राम" शब्द के बारंबार उच्चारण का आशय यदि भगवान राम का दर्शन हैं, तो दोहराने की वृत्ति में स्वतः तीव्रता आ जाएगी। उसे आप रोक ही नहीं सकते, क्योंकि आप शब्द के माध्यम से उसके रूप का दर्शन करना चाहते हैं। इस संकल्प से किए गए जप में अधीरता बढ़ती है और शब्दों की गति स्वाभाविक रूप से तेज़ होती जाती है। जैसे जैसे शब्दों की गति में तेज़ी आएगी वैसे वैसे शब्दों को तेज करने वाले में अधीरता बढ़ेगी । और इस अधीरता में भले ही दैहिक रोग न हो किंतु अधीरता स्वयं में एक मानसिक रोग है । 

अब एक और पक्ष देखें। अधीरता और शीघ्रता से जप करने वाले अनेक लोग सौ वर्ष से अधिक जी सकते अहीन और जिए भी हैं। किंतु यह भी स्मरण रहे कि गाँवों में बहुत से लोग सुरती-तंबाकू खाते हुए भी 100 वर्षों से ऊपर निकालते हुए पाये गए हैं । यहाँ तक कि बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो बिना किसी धार्मिक क्रिया के, नब्बे वर्ष से ऊपर जी लेते हैं। और ऐसे भी अनेक लोग हैं जो ध्यान का अभ्यास करते हुए भी कम वर्ष जिए हैं कुछ को तो भयंकर रोग भी हुए। यहाँ पर अनुभव यह करना है कि जीवन की लंबाई सिर्फ़ मन की तेज़ी और धीमापन पर ही सौ फ़ीसदी निर्भर नहीं करता है , बल्कि वाह्य वातावरण का भी प्रभाव होता है । एक घुमंतू गुरु जो बार बार वातावरण और खाने के बदलाव को झेलता है , उसका दुष्प्रभाव भी तो पड़ता है । 

जैसे एक उदाहरण से यहाँ समझ सकते हैं, आध्यात्म में आदि शंकराचार्य हुए जो ज्ञान की सर्वोच्च शिखर पर थे वे कम वर्ष ही जिए । अब ज्ञान के सर्वेश अवस्था की अनुभूति और प्राप्ति तो शब्दों की जल्दीबाजी से तो हुई नहीं होगी । उनके अल्पतम जीवन के लिए संभव है कि उनका भ्रमणकारी होना हो , वातावरण और भोजन में बहुत बारम्बार बदलाव होने से भी देह पर कई बार दुष्प्रभाव पड़ता है । 

एक अन्य पक्ष पर भी ध्यान देना होगा कि गति में परमात्मा नहीं है, गति तो प्रकृति का स्वभाव है । जब शब्दों माध्यम से मन गतिमान होता है तब उसमें परमात्मा का अनुभूति संभव नहीं है । प्रकृति में स्थित उस गति से पुरुष को स्वयं के स्थिर होने का बोध होता है । पुरुष का मूल स्वभाव तो स्थिरता है , यदि वह शब्दों के माध्यम से स्थिरता का बोध करता है तभी परमात्म तत्व की अनुभूति संभव है । अन्यथा शब्द , शब्द से रूप का निर्माण और रूप से रंग आकार इत्यादि का निर्माण करते हुए भावों के जाल में फँस जाना ही होता है । 

अंततः मेरे अनुसंधान का विषय किसी अन्य विषय की आलोचना व तिरस्कार करना नहीं हो सकता है । यह तो संभव हो नहीं सकता मेरे लिए । मेरा विषय सिर्फ इतना है कि जीवन को उत्तम से उत्तम कैसे किया जा सके जिसमें मन तो स्वस्थ रहे ही देह और इन्द्रियाँ भी स्वस्थ रहें । इस प्रकृति ने जो देह दिया है वह प्रकृति के सार्वभौमिक नियम से ही चल रही है , मन प्रकृति को समझकर जितना शांत और स्थिर हो जाएगा उतना ही देह को और मन स्वयं को निरोगी कर देगा ।  मन को यही समझना है कि क्रियाशीलता में स्वास्थ्य अर्थात स्थिरता नहीं है । 

इसलिए साधक को सदा यह देखना चाहिए कि जो वह कर रहा है, उससे बोध बढ़ रहा है या नहीं। तटस्थता वास्तव में घट रही है या नहीं। निःशब्दता का अनुभव हो रहा है या नहीं। आत्मानुभव हो रहा है या नहीं।

ध्यान देना जहाँ शब्द छूट जाए और मौन उतर आए,  वहीं पर शब्दों के पैदा करने वाले का बोध हो सकता है । 

— योगी अनूप

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