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सतही श्वास का रहस्य क्या है?

1 week ago By Yogi Anoop

सतही श्वास (Shallow Breathing) का रहस्य क्या है?

सतही श्वास का अर्थ है बहुत छिछली और तेज़-तेज़ साँस लेना। यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति गहराई से साँस नहीं लेता, बल्कि जल्दी-जल्दी साँस अंदर-बाहर करता रहता है, और बीच में ठहराव (pause) बहुत कम होता है।

साँसों में जल्दीबाज़ी के दो अर्थ हैं—एक, साँसों की यात्रा चाहे वह अंदर जाने की हो अथवा बाहर निकलने की, दोनों में जल्दीबाज़ी होती है; और दूसरा, इन दोनों यात्राओं के मध्य जो ठहराव है, वह अत्यंत कम होता है। स्वाभाविक रूप से, जब यात्रा में जल्दीबाज़ी होती है, तो उसके मध्य का ठहराव भी कम हो जाता है।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। यदि हृदय की गति एक मिनट में सामान्यतः 70 बार होती है, तो इसका अर्थ है कि 70 बार ठहराव भी आया। किंतु यदि यही गति बढ़कर 120 बार प्रति मिनट हो जाए, तो निश्चित रूप से ठहराव की संख्या तो 120 बार होगी, परंतु प्रत्येक ठहराव की अवधि बहुत कम हो जाएगी—70 की तुलना में।

उसी प्रकार, यदि साँसों की गति तेज़ हो जाती है, तो उनके मध्य का ठहराव भी बहुत कम हो जाता है। इसी को मैं ‘सतही साँसें’ कहता हूँ। ये सतही साँसें इसलिए हैं क्योंकि मनुष्य इन्हें अस्वाभाविक रूप से अपनाता है। यह उसका स्वभाव नहीं है, किंतु अज्ञानवश उसने इसे अपना स्वभाव बना लिया है।

यद्यपि प्रकृति में कुछ जीव—जैसे कुत्ते—स्वभावतः सतही श्वास लेते हैं, और उनके लिए यह सामान्य है। यह उनकी प्रकृति में निहित है। किंतु मनुष्य के लिए स्वाभाविक श्वास गहरी, संतुलित और अपेक्षाकृत धीमी होनी चाहिए। इसका कारण यह है कि मनुष्य एक ज्ञानात्मक जीव है, जो ज्ञान से संचालित होता है। यदि वह अज्ञान से संचालित होगा, तभी उसमें सतही श्वास उत्पन्न होगी।

जब मन में आवश्यकता से अधिक भय, लालच, चिंता या क्रोध निरंतर चलता रहता है, तब श्वास सतही हो जाती है। ऐसी अवस्था में श्वास में न स्थिरता आती है, न सौम्यता। यह मेरा अनुभव है।

इसलिए यदि कोई व्यक्ति लगातार सतही श्वास ले रहा है, तो मैं उसे एक बड़े असंतुलन के रूप में देखता हूँ।

मैं यह स्वीकार करता हूँ कि छोटे बच्चों में तेज़ और हल्की साँस लेना सामान्य हो सकता है, क्योंकि उनका शरीर और मन अभी विकसित हो रहा होता है। किंतु यदि कोई वयस्क—जैसे 50 या 60 वर्ष का व्यक्ति—वैसी ही साँस ले रहा है, तो उसे सतही श्वास कहा जाएगा।

जहाँ तक मेरा अनुभव है, सतही श्वास केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को भी दर्शाती है। इसका सीधा संकेत यह है कि व्यक्ति भीतर से असंतुष्ट (dissatisfied) है। उसका स्वयं के साथ अनुभव बहुत कम है। संभवतः उसने अपनी संतुष्टि का स्रोत कहीं बाहर केंद्रित कर लिया है।

ध्यान दें—जब व्यक्ति अपने भीतर आने वाले वास्तविक ‘भोजन’ से संतुष्ट नहीं हो पाता, तो वह बाहरी वस्तुओं से कैसे संतुष्ट होगा? इस ‘भोजन’ में एक महत्वपूर्ण तत्व साँस है—अर्थात् वायु का भोजन।

जब कोई व्यक्ति अपनी साँस से ही संतुष्ट नहीं हो पाता, तो वह अन्य चीज़ों—जैसे भोजन, इंद्रिय-अनुभव या जीवन की गतिविधियों—से भी संतुष्ट कैसे हो पाएगा?

सतही श्वास का अर्थ यह भी है कि व्यक्ति न तो अपनी कर्मेंद्रियों (क्रियाओं) से संतुष्ट है और न ही ज्ञानेंद्रियों (अनुभवों) से। उसमें किसी भी अनुभव को गहराई से जीने की क्षमता कम हो जाती है।

इसे एक सरल उदाहरण से समझा जा सकता है। जब हम भोजन करते हैं, तो स्वाद का अनुभव लेने के लिए भोजन को कुछ क्षण जीभ पर ठहराना आवश्यक होता है। यदि हम उसे तुरंत निगल लेते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम वास्तव में उसका स्वाद नहीं ले रहे। इसी प्रकार, साँस के साथ भी एक न्यूनतम ठहराव और गहराई आवश्यक होती है—तभी उसका पूर्ण अनुभव संभव है।

अतः सतही श्वास केवल साँस लेने का एक तरीका नहीं है, बल्कि यह जीवन को सतही रूप से जीने का संकेत भी है। इसका समाधान है—सचेत होकर, धीमी और गहरी श्वास लेना, और प्रत्येक अनुभव को थोड़ी देर ठहरकर, पूर्ण रूप से महसूस करना।

अंततः, गहरी और संतुलित श्वास ही संतोष, स्थिरता और पूर्णता की ओर ले जाती है।


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