मैं रास्ते पर टहल रहा हूँ। एक दिशा में, निरंतर गति में। अचानक मुझे लगता है कि रुक जाना चाहिए। तो मैं क्या करता हूँ? मैं रुक जाता हूँ। बस इतना ही। मैं टहलना बंद कर देता हूँ—टहलना बंद करने में कोई भी जटिलता नहीं होती है । मार्ग नहीं बदलता, दिशा नहीं बदलता। चलने की क्रिया संपूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है।
अब इसी उदाहरण को मन के साथ रखकर देखें।
मैं किसी विषय पर सोच रहा हूँ व कोई भी विषय मेरे मन में अनय ही चल रहा है । मेरा मन एक विचार के साथ गतिमान है। मुझसे कहा जाता है—"अब सोचना बंद कर दो। व यह सोचने की क्रिया बंद कर दो" । अगर चलने का उदाहरण सच है, तो मुझे यही करना चाहिए जो मैंने टहलते समय किया था। बस रुक जाना। विचार को संपूर्ण रूप से विराम देना। किसी दूसरे विचार में न जाना—केवल रुक जाना। किंतु मन ऐसा नहीं करता।
चलना बंद करना बनाम मार्ग बदलना
जब मुझसे कहा जाता है "सोचना बंद कर दो", तो मेरा मन उस विचार को हटा देता है और तुरंत किसी दूसरे विचार को उसके स्थान पर रख देता है। मैंने समस्या के बारे में सोचना बंद किया, अब किसी और बात के बारे में सोचने लगता हूँ। पहला विचार चला गया, किंतु सोचने की प्रक्रिया कभी रुकी ही नहीं। केवल विषय बदल गया।
यह ठीक उसी व्यक्ति जैसा है जो टहलते-टहलते एक मार्ग को छोड़कर दूसरा मार्ग पकड़ ले। बाहर से लगता है कि दिशा बदल गई, पर वास्तव में चलना कभी रुका नहीं। वह अब भी टहल रहा है।
यहीं मौलिक अंतर है। **चलना बंद करना** और **रास्ता बदलना** भिन्न क्रियाएँ हैं। जब मैं रुक जाता हूँ, तो चलना बंद हो जाता है। मेरा शरीर , मेरी इंद्रियाँ भू रुक जाती हैं और जब रुकने के बजाय किसी दूसरे रास्ते पर चलने लगता हूँ, तो गति रुकती नहीं बल्कि जारी रहती है बस दिशा अलग होती है।
मन के साथ भी यही होता है। एक विचार को छोड़कर दूसरे में चले जाने का अर्थ है ‘विचार का विषय बदलना’ ‘सोचना बंद नहीं करना’। और जब हम सच में सोचना बंद करना चाहते हैं, तो हमें एक विचार के बाद दूसरा विचार नहीं लाना चाहिए। बस रुक जाना चाहिए। किंतु यह होता नहीं है ।
मन की आदत: रुकने के बजे खाली स्थान को भरना
यह सब क्यों होता है? क्योंकि मन को गति की आदत हो गई है। वह गति को ही जीवन समझ बैठा है। उसे यह भ्रम है कि चलायमान होना ही जीवन है , संभवतः इसीलिए विचार की निरंतर प्रक्रिया ही उसकी सक्रियता में ही संलग्न है। जब विचार की गति रुकती है, तो मन को भय लगता है। उसे खाली स्थान असहनीय लगता है। वह सोचता है—यदि कोई विचार नहीं होगा तो क्या होगा? यह तो जीवन है ही नहीं । एक अन्य तथ्य कि वह बचपन से ही मन इतना अभ्यस्त है किसी न किसी विचार में संलग्न रहता है । यही उसे सत्य लगता है ।
इसलिए स्वभावतः वह एक विचार समाप्त होते ही वह तुरंत दूसरा पकड़ लेता है। वह खाली पल को भर देता है। अगला विचार तुरंत आ जाता है—कभी स्मृति, कभी चिंता, कभी योजना। इस निरंतर धारा में, मन कभी सच में रुकता ही नहीं।
लेकिन यह जो ‘खालीपन’ व आकाश है, क्या यह वास्तव में खाली है? नहीं। यह विचार की अनुपस्थिति है जो मन के विश्राम की एक छोटी सी झलक है । उस पल में मन के श्रम का आभाव मौजूद होता है , उसी क्षण में विश्राम की अनुभूति होती है —इसी को मौन भी कहते हैं । वह आंतरिक शांति जो विचारों की गति में छिपी हुई है।
दो महत्वपूर्ण अंतर
पहला अंतर:- विचार को दबाना बनाम विचार का रुकना। जब हम किसी विचार को बलपूर्वक रोकने की कोशिश करते हैं, तब हमारा पूरा ध्यान उसी पर केंद्रित होता है। हम कहते हैं—"यह विचार नहीं आना चाहिए।" पर यह कहना ही विचार है। इस संघर्ष में विचार और भी मजबूत तथा जीवित व सक्रिय हो जाता है।
दूसरा अंतर:- विषय बदलना बनाम प्रक्रिया को रोकना। हम सोचते हैं कि विचार बदल देने से विचार बंद हो गया। लेकिन सोचने की प्रक्रिया तो चलती ही रहती है। केवल विषय बदलता है।
असली समाधान यह है—दो विचारों के बीच के सूक्ष्म अंतराल को अनुभव करना, उसी पल मन के सामने विकल्प होता है: आगे जाना या रुक जाना। सामान्यतः हम स्वचालित रूप से आगे चले जाते हैं। किंतु यदि उस पल में जागृत रहें, यदि अगले विचार में न जाएँ, तो विचार अपने-आप रुक जाता है। टहलते हुए रुकने के लिए दूसरा मार्ग नहीं चाहिए। उसी तरह सोचना बंद करने के लिए दूसरा विचार नहीं चाहिए।
सत्य तो यही है कि विचार का अंत करने का तात्पर्य यह नहीं कि किसी नए विचार की शुरुआत करें। विचार का अंत—विचार का अंत ही है।
— योगी अनूप
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