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पेट की समस्या का उपाय

15 hours ago By Yogi Anoop

पेट की समस्या केवल पेट की समस्या नहीं है

पेट की समस्या आज एक बहुत सामान्य समस्या बन चुकी है। गैस, अपच, एसिडिटी, पेट फूलना, कब्ज, भूख का असंतुलन या भोजन के बाद असहजता—इनमें से कोई न कोई समस्या बहुत से लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई है। कई बार इसकी शुरुआत बचपन से ही दिखाई देने लगती है और व्यक्ति धीरे-धीरे उसे अपने जीवन का सामान्य हिस्सा मान बैठता है। और उसी में जीने का एक तरह से अभ्यास हो जाता है । 

लेकिन जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, पेट की समस्या का संबंध केवल भोजन से नहीं रह जाता। भोजन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ-साथ हमारी दैनिक मानसिक अवस्था, सोचने का ढंग, तनाव, नींद, इंद्रियों का निरंतर उपयोग और जीवन जीने की गति भी शरीर को प्रभावित करने लगती है।

यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या पेट की समस्या वास्तव में केवल पेट की समस्या है?

यदि हम थोड़ा गहराई से देखें, तो पाएँगे कि हमारा शरीर अलग-अलग हिस्सों में बँटा हुआ दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वह एक-दूसरे से जुड़े हुए तंत्र की तरह काम करता है। मन में कोई विचार उत्पन्न होता है, मस्तिष्क उसे संसाधित करता है और उसका प्रभाव शरीर की विभिन्न क्रियाओं पर पड़ता है। इसी प्रकार शरीर में उत्पन्न कोई असहजता हमारी मानसिक अवस्था को प्रभावित कर सकती है।

इसलिए केवल पेट को ठीक करने की कोशिश करना कभी-कभी पर्याप्त नहीं होता। पेट, मस्तिष्क और मन के बीच सामंजस्य को समझना भी उतना ही आवश्यक है।

आज पेट से संबंधित समस्याओं के लिए लोग विभिन्न चिकित्सा-पद्धतियों की ओर जाते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान हो या कोई अन्य चिकित्सा-पद्धति, पेट से संबंधित शिकायतें बहुत बड़ी संख्या में देखने को मिलती हैं। संभवतः इसकी संख्या सर्वाधिक है । इसका एक कारण यह भी है कि हम समस्या को अक्सर उसके अंतिम लक्षण के रूप में देखते हैं। गैस हुई तो गैस को कम करना है, एसिडिटी हुई तो एसिडिटी को दबाना है, पेट फूल रहा है तो उसे कम करना है।


लेकिन एक दूसरा प्रश्न भी पूछा जा सकता है—

जिस मानसिक परिस्थिति में ये लक्षण बार-बार उत्पन्न हो रहे हैं, क्या हमने उस परिस्थिति को समझने का प्रयास किया है?

मेरे विचार से केवल किसी एक अंग या केवल एक लक्षण पर काम करने के बजाय मन, मस्तिष्क और शरीर के बीच सामंजस्य को समझना आवश्यक है। जब इन तीनों के बीच की कार्यप्रणाली को समझना शुरू किया जाता है, तब शरीर के संकेतों को देखने का हमारा दृष्टिकोण भी बदलने लगता है।

समस्या यह है कि इसे समझने में समय लगता है, जबकि हमें समाधान तुरंत चाहिए।

हमें आज समस्या हुई और हम चाहते हैं कि आज ही उसका समाधान मिल जाए। हम वर्षों से चली आ रही अपनी आदतों, अपनी मानसिक प्रतिक्रियाओं और अपनी जीवनशैली को बदलने के लिए तैयार नहीं होते, लेकिन परिणाम तुरंत चाहते हैं।

यही विरोधाभास है।


कई बार हम किसी समस्या के समाधान की खोज में वर्षों लगा देते हैं, अलग-अलग उपाय आजमाते हैं, फिर भी उस मार्ग को अपनाने में संकोच करते हैं जिसमें पहले कुछ समय केवल समझने में लग सकता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि शरीर को समझने के साथ साथ स्वयं की मानसिकता को समझना उपचार की प्रक्रिया का एक हिस्सा है ।


एक छोटा-सा प्रयोग

इसी समझ को अनुभव करने के लिए एक सरल प्रयोग किया जा सकता है।


दाहिनी करवट लेटकर धीरे से पेट के बल आने की स्थिति में रहें। शरीर को अनावश्यक रूप से तनाव न दें। अब इस अवस्था में साँस को अपेक्षाकृत शीघ्रता से भीतर भरें और फिर उसे सहजता से, आराम से छोड़ दें।


यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साँसों को शीघ्रता से लेना और उसे छोड़ने के शब्द को समझना है । यदि इसे न समझेंगे तो कोई लाभ न हो सकेगा । 

जिसका मन बहुत छिछला होता है वह वह अपनी समझ के अनुरूप बहुत छिछला अभ्यास भी करता है जो उसके रोग में वृद्धि ही कर देता है । बस शब्द के मूल अर्थ को समझें और उन्ही शब्दों की सीमाओं को समझते हुए अभ्यास करें । चूँकि शब्दों को बिना समझे हुए करते हैं और शब्दों में अपनी कल्पनाओं को जोड़ देते अहीन तो अभ्यास अच्छी तरह से नहीं होता है । और ध्यान यह भी देना है कि किसी भी अभ्यास को केवल इसलिए न करें कि किसी ने कहा है कि इससे तुरंत लाभ होगा। पहले उसे समझें, अपने शरीर की प्रतिक्रिया को देखें और फिर धीरे-धीरे अभ्यास करें। 

समझने में दो दिन लगें या दस दिन—कोई बात नहीं। क्योंकि यहाँ लक्ष्य केवल एक तकनीक सीखना नहीं है। लक्ष्य यह समझना है कि हमारी साँस, हमारा शरीर, हमारा मन और हमारी दैनिक अवस्था एक-दूसरे से कैसे जुड़े हुए हैं। जब समझ पैदा होती है, तब अभ्यास केवल एक क्रिया नहीं रह जाता। वह अनुभव का माध्यम बन जाता है।


और शायद स्वास्थ्य की दिशा में पहला कदम किसी नए उपाय को ढूँढ़ना नहीं, बल्कि अपने भीतर चल रही प्रक्रिया को समझना ही है। पहले समझिए, फिर प्रयोग कीजिए—क्योंकि बिना समझ के किया गया अभ्यास केवल क्रिया है; समझ के साथ किया गया अभ्यास अनुभव है।

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