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मान्यताओं से मनोरोग

4 days ago By Yogi Anoop

मान्यताओं से मनोरोग : 

ध्यान देने योग्य बात यह है कि मन उसी पर कार्य कर सकता है जिसे वह जानता है, जिसे वह कर सकता है। मन भला क्या क्या कर सकता है ! एक छिछला व अतिसाधारण मन किसी वस्तु को देखकर उससे संबंधित अधिक से अधिक , और जल्दी से जल्दी ख़ुशी व प्रसन्नता वाले रस निकालना चाहता है । इसीलिए वह वस्तु से संबंधित स्वनिर्मित कल्पनाओं को करके स्वयं को प्रसन्न करता है । 

वस्तुतः वह वस्तु को वस्तु के रूप में देखना अति साधारण मानता है । क्योंकि उससे उसे कोई अतिरिक्त प्रसन्नता मिल ही नहीं रही है । जैसे गुरु को गुरु की दृष्टि से न देखकर भगवान देखने लगें तो श्रद्धा भक्ति वाले अधिक रस पैदा होंगे । कहने का मूल अर्थ है कि उसकी मनोवृत्ति में वस्तु के प्रति जब तक कोई और मान्यताएं नहीं चिपकायी जाएगी तब तक उसे प्रसन्नता ख़ुशी मिल नहीं पायेगी ।

किंतु ध्यान दें वे मान्यताएं चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक हो , वस्तुतः वे वस्तु का मूल स्वरूप तो है नहीं । वस्तु के प्रति वह आपकी अपनी बनायी हुई मान्यता मात्र है जो आपको क्षण भर के लिए अतिरिक्त प्रसन्नता शांति दे सकती है और देती भी है किंतु वास्तव में वह वस्तु के मूल सत्य का बोध नहीं करवाती है । न तो वस्तु की सत्यता का बोध और ना ही जो वस्तु को देख रहा है उसका बोध हो पाता है । अर्थात् दृष्टा न तो दृश्य के मूल स्वरूप को बोध कर पाता है और न ही दृश्य के माध्यम से दृष्टा स्वयं का बोध कर पाता है । 

वह तो सिर्फ़ दृश्य को देखकर कुछ भिन्न तरीके से ही वृत्ति को निर्मित कर लेता है । जो सिर्फ़ मन के द्वार निर्मित ख़याली पुलाव के लिए जीता है ना कि बोध के लिए । 

ध्यान दें जैसे यदि मन देह को मल-मूत्र और गंदगी का घर मानता है, तो वही मन उसे इसके विपरीत मंदिर भी मान सकता है। जब उसे ब्रह्मचर्य सिद्ध करना होता है तब इस देह को मलमूत्र का घर और जब उसे कुछ सकारात्मक देखना होता है तब इसी देह में मंदिर व भगवान देखने लगता है । हृदय के अंदर बेस हुए भगवान को देखने लगता है । ध्यान दें जैसे ही मन किसी वस्तु में अपनी कल्पनाओं की शुरुवात करता है तो उसके बाद कल्पनाओं के बारिश की शुरुवात करनी ही पड़ती है । यह मन की मजबूरी है । 

जैसे ही हम देह को “मंदिर” मानते हैं, उसी क्षण एक नई श्रृंखला शुरू हो जाती है—मंदिर है तो उसमें भगवान भी होंगे; मस्तिष्क के भीतर भगवान कृष्ण की कल्पना करनी पड़ेगी; प्रत्येक चक्र में किसी न किसी देवी-देवता की स्थापना करनी पड़ेगी। इस प्रकार विचारों का विस्तार बढ़ता जाता है और मन अनजाने में ही उलझता चला जाता है।

यहीं से ओवरथिंकिंग का भी आरम्भ होता है। और विडंबना यह है कि इस ओवरथिंकिंग के भीतर रहते हुए हमें यह भी ज्ञात नहीं होता कि मन स्वयं ही यह सब रच रहा है।

किंतु बहुत सूक्ष्म रूप से देखने पर यह दिखता है कि यह पूरा खेल मन के द्वार ही रचित  है—यह सब कल्पना और अवधारणा की ही गतिविधि है। यदि सत्य रूप में देखें तो न तो वह मंदिर है और न ही मलमूत्र का घर है, यह तो देह मात्र है । धीरे धीरे इसी प्रकार की मनोनिर्मित मान्यताओं से मन बोझ से दबता जाता है और मनोरोग से ग्रसित हो जाता है । वह दृश्य व वस्तु के वास्तविक स्वरूप का अनुभव भी नहीं कर पाता है , दृष्टा की तो बात ही छोड़ दो ।  और ध्यान दो इस प्रकार के मनोबोझ से देह के अंगों पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ता होगा जो रोग के रूप में भविष्य में दिखता है । 

आध्यात्मिकता के गूढ़ रहस्यों को देखो तो मन को इन सभी मान्यताओं और विचारों के बोझ से वास्तविक मुक्ति तब मिलेगी, जब वह देह को केवल देह के रूप में अनुभव करेगा। “मैं देह को अनुभव कर रहा हूँ”—बस इतना ही पर्याप्त है। यहाँ कोई कल्पना नहीं, कोई अवधारणा नहीं, केवल सीधा अनुभव है। दृष्टा दृश्य का अनुभव कर रहा है और दृश्य के माध्यम से दृष्टा स्वयं का भी बोध कर रहा है । इतना सरल और क्या हो सकता है । 


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