पैटर्न : सहूलियत से अनुभव की ओर
हमारा मन पैटर्न बनाता है, क्योंकि पैटर्न उसके लिए सहूलियत है। मन हर कार्य को बार-बार नए सिरे से करने में अपनी ऊर्जा खर्च नहीं करना चाहता। इसलिए वह अनुभवों को स्मृति में रखता है और उन अनुभवों से एक निश्चित ढाँचा बना लेता है। फिर अगली बार वही परिस्थिति आती है तो उसे दोबारा विचार नहीं करना पड़ता; वह उसी बने हुए पैटर्न के अनुसार काम कर लेता है। इसे बहुत सामान्य उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए आप अपने किचन में जाते हैं और आपने अपनी सुविधा के अनुसार नमक, मसाले और बाकी चीज़ों के डिब्बों को एक निश्चित स्थान पर रख दिया है। अब जब खाना बनाते समय आपको नमक चाहिए, तो आपको यह सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि नमक कहाँ रखा है। हाथ अपने आप उस दिशा में चला जाता है और आप नमक उठा लेते हैं। यह पैटर्न आपने अपनी सहूलियत के लिए बनाया है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति नमक की डिब्बी को उसकी जगह से हटाकर दूसरी जगह रख दे, तो आपको तुरंत असुविधा होने लगेगी। वस्तु किचन में ही किंतु निधारित स्थान पर नहीं है, किचन वही है, लेकिन आपका पैटर्न बदल गया।
इसलिए उस निश्चित स्थान पर वस्तु के न होने पर मन को असुविधा होने लगती है । उसके मन का सामान्य पैटर्न टूट जाता है ।
यही बात हमारे पूरे जीवन में दिखाई देती है। हम चलने, बोलने, खाने, काम करने, सोचने, प्रतिक्रिया करने और यहाँ तक कि सुख अनुभव करने के भी पैटर्न बना लेते हैं। धीरे-धीरे ये पैटर्न इतने सहज हो जाते हैं कि हमें यह पता ही नहीं चलता कि हम वास्तव में कुछ कर रहे हैं या केवल अपने पुराने पैटर्न को दोहरा रहे हैं। कार चलाने का उदाहरण लें। जब कोई व्यक्ति ड्राइविंग सीखता है, तब शुरुआत में उसे हर छोटी चीज़ पर ध्यान देना पड़ता है—क्लच कब दबाना है, गियर कब बदलना है, ब्रेक कब लगाना है, कब दाएँ मुड़ना है और कब बाएँ। लेकिन अभ्यास के बाद इन सबका एक पैटर्न बन जाता है। अब वह पाँच सौ किलोमीटर तक कार चला सकता है और हर क्षण यह सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि अगला गियर कब बदलना है। माइंड ने सतह के इस काम को अपने लिए सहज बना लिया है।
लेकिन यहाँ एक सूक्ष्म अंतर है—सहज (एक पैटर्न में होना) होना और जागरूक होना एक ही बात नहीं है। किसी काम का सहज हो जाना केवल यह बताता है कि उसका पैटर्न बन गया है; यह आवश्यक नहीं कि उस काम का अनुभव भी गहरा हो गया हो। जब ड्राइविंग का पैटर्न बन जाता है, तब वास्तव में मन के पास अवसर होना चाहिए कि वह ड्राइविंग की गहराई को अनुभव करे। लेकिन यदि ड्राइविंग केवल एक यांत्रिक क्रिया बन गई और व्यक्ति उसमें उपस्थित ही नहीं है, तो वह ड्राइविंग से संतुष्ट नहीं होगा। तब वह ड्राइविंग करते समय किसी और चीज़ से उत्तेजना या मनोरंजन लेने लगेगा—गाने सुनेगा, बातचीत करेगा या अपना ध्यान किसी दूसरी चीज़ में लगाएगा। इसका कारण यह हो सकता है कि ड्राइविंग अब उसके लिए केवल एक स्वचालित पैटर्न रह गई है, अनुभव नहीं।
यही बात भोजन के साथ भी है। बचपन में खाने का एक पैटर्न बनता है—जल्दी खाना, जल्दी चबाना, स्वाद को बहुत देर तक न ठहराना और फिर आगे बढ़ जाना। बच्चों में ऐसा स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है। वे बहुत-सी चीज़ें जल्दी-जल्दी करते हैं। लेकिन यदि वही पैटर्न उम्र बढ़ने के बाद भी बना रहे, तो व्यक्ति भोजन के वास्तविक अनुभव से दूर हो सकता है। वह खा तो रहा है, लेकिन शायद भोजन को पूरी तरह अनुभव नहीं कर रहा। जीभ स्वाद ले रही है, शरीर भोजन ग्रहण कर रहा है, लेकिन मन उस अनुभव में पूरी तरह उपस्थित नहीं है। यहाँ समस्या भोजन में नहीं, बल्कि उस पुराने पैटर्न में हो सकती है जो अब भी अपना काम उसी तरह कर रहा है जैसे बचपन में करता था।
इसलिए यह समझना आवश्यक है कि पैटर्न का निर्माण जीवन को सहज बनाने के लिए होता है, जीवन को अनुभव करने के लिए नहीं। यदि किचन में आपको नमक की डिब्बी ही खोजने में आधा घंटा लग जाए, तो आपका ध्यान खाना बनाने की गुणवत्ता पर कैसे जाएगा? इसलिए आपने नमक को एक निश्चित स्थान पर रखा। लेकिन नमक कहाँ रखा है, यह जान लेना खाना बनाने की गुणवत्ता नहीं है। वह केवल सहूलियत है, ताकि आपकी ऊर्जा उस काम की वास्तविक गुणवत्ता पर जा सके। इसी प्रकार माइंड में भी पैटर्न इसलिए बनते हैं कि सतह के कार्य सहज हो जाएँ और उसके बाद हमारी चेतना उन अनुभवों की गहराई में जा सके।
लेकिन मनुष्य अक्सर यहीं भूल कर देता है। जिस पैटर्न को उसने अपनी सहूलियत के लिए बनाया था, बाद में उसी पैटर्न को वह अनुभव और संतुष्टि का स्रोत समझने लगता है। फिर पैटर्न बदलता है तो उसे लगता है कि जीवन में कुछ गलत हो गया। वास्तव में कई बार जीवन में कुछ गलत नहीं हुआ होता; केवल उसकी बनाई हुई व्यवस्था बदल गई होती है। इसलिए पैटर्न को अंतिम सत्य मान लेना एक सूक्ष्म बंधन है।
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो हमारे संस्कार और प्रतिक्रियाएँ भी कुछ इसी प्रकार काम करते हैं। किसी अनुभव को बार-बार दोहराने से मन में एक निश्चित राह बन जाती है। फिर वही परिस्थिति आती है और प्रतिक्रिया लगभग अपने आप निकल जाती है। हम सोचते हैं कि हमने प्रतिक्रिया दी, लेकिन कई बार वास्तव में प्रतिक्रिया हमारे पुराने पैटर्न ने दी होती है। इसलिए आध्यात्मिक यात्रा का अर्थ केवल पैटर्न को तोड़ देना नहीं है; बल्कि पहले यह देख पाना है कि मेरे भीतर कौन-सा पैटर्न चल रहा है। जिस क्षण मैं अपने पैटर्न को देखना शुरू करता हूँ, उसी क्षण मैं केवल पैटर्न नहीं रह जाता। वहाँ देखने वाला और देखे जाने वाला, दोनों के बीच एक दूरी उत्पन्न होती है। शायद यहीं से जागरूकता का प्रारंभ होता है।
इसलिए पैटर्न आवश्यक हैं। बिना पैटर्न के जीवन का प्रत्येक छोटा कार्य कठिन हो जाएगा। लेकिन पैटर्न में फँस जाना आवश्यक नहीं है। पैटर्न को साधन की तरह उपयोग करना है, पहचान की तरह नहीं। पैटर्न हमें सतह पर सहज करता है ताकि हम जीवन की गहराई में जा सकें। यदि हम हर समय सतह को ही व्यवस्थित करने में लगे रहेंगे, तो गहराई में जाने का अवसर ही नहीं मिलेगा।
इसलिए पैटर्न को सहूलियत तक सीमित रखिए और अनुभव को उससे आगे जाने दीजिए। काम अपने पैटर्न से हो सकता है, लेकिन अनुभव केवल जागरूकता से होता है। पैटर्न जीवन को आसान बनाता है, पर जागरूकता जीवन को गहरा करती है। और शायद मनुष्य के लिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि उसने कितने पैटर्न बना लिए हैं, बल्कि यह है कि क्या वह अपने बनाए हुए पैटर्न को देख पा रहा है, या स्वयं उसी पैटर्न का हिस्सा बन चुका है?
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