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मन का एक और रोग

4 days ago By Yogi Anoop

विपर्यय व मिथ्याज्ञान : जब मन वस्तु से अधिक अपने सुख को चुनता है

मन का एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत गहरा रोग है—वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में न देख पाना। योगसूत्र में इसे “विपर्यय” कहा गया है—“विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूप प्रतिष्ठम्”—अर्थात् जो वस्तु जैसी है, उसे वैसा न जानकर किसी अन्य रूप में स्थापित कर लेना ही मिथ्या ज्ञान है। यह केवल ज्ञान की त्रुटि नहीं, बल्कि देखने की वृत्ति का विकार है; एक ऐसी प्रवृत्ति, जहाँ चेतना वस्तु के सत्य की अपेक्षा अपने भीतर की कल्पना को अधिक वास्तविक मान बैठती है।

यदि इस विचार को और गहराई में ले जाएँ, तो यही बात उपनिषद के अनेक स्थलों पर भिन्न-भिन्न भाषा में प्रकट होती है। वहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि हम जिस जगत् को देखते हैं, वह वस्तु का पूर्ण सत्य नहीं, बल्कि हमारी चेतना के द्वारा आरोपित अर्थों का एक जाल है। “नेति-नेति”—यह नहीं, वह नहीं—कहकर उपनिषद हमें हर उस परत को हटाने के लिए प्रेरित करते हैं, जिसे हमने वस्तु पर चढ़ा रखा है। वस्तु को जानने की यह प्रक्रिया, वास्तव में अपने ही भ्रमों को हटाने की प्रक्रिया है।

सामान्य जीवन में भी यह विपर्यय निरंतर घटित होता रहता है। अँधेरे में रस्सी को सर्प समझ लेना केवल एक उदाहरण नहीं, बल्कि एक प्रतीक है—यह दिखाता है कि हम वस्तु को नहीं, अपनी आशंका को देखते हैं। रात में किसी विचित्र वेशभूषा वाले व्यक्ति को भूत मान लेना, हिमालय की बर्फ़ीली चोटियों में भगवान शिव का स्वरूप देख लेना—ये सब वही प्रवृत्तियाँ हैं जहाँ मन अपनी कल्पनाओं को वस्तु पर आरोपित कर देता है। यहाँ वस्तु नहीं बदलती, दृष्टि बदल जाती है।

उपनिषदों में एक और सूक्ष्म संकेत मिलता है—“यथा दृष्टि तथा सृष्टि”। अर्थात् सृष्टि वैसी नहीं है जैसी वह अपने आप में है, बल्कि वैसी है जैसी हमारी दृष्टि उसे बना देती है। यही कारण है कि एक ही वस्तु किसी के लिए पूज्य बन जाती है और किसी के लिए तुच्छ। एक ही शरीर कभी मंदिर प्रतीत होता है और कभी केवल नश्वर तत्वों का समूह। वस्तु में यह द्वैत नहीं है; यह द्वैत हमारे देखने में है। रोग देखने के तरीके में है । जैसे ज्यादातर लोग भोजन करते समय भोजन में भगवान देखते हैं । ऐसे लोग ज्यादातर भोजन में अति करते हुए देखे जाते हैं । वाह इसलिए कि भोजन को भोजन के रूप में देखने के बजाय कुछ और देखा जा रहा है । यहाँ परमात्मा के को किसी एक ही रूप में जो उनके मन में रचित है , उसी रूप में मानने के लिए मन को विवश करते हैं । 

और जब हम इस देखने की प्रक्रिया को और सूक्ष्मता से समझते हैं, तो एक और सत्य प्रकट होता है—मन वस्तु को इसलिए विकृत करता है क्योंकि उसे सत्य से अधिक मनो-सुख प्रिय है। वस्तु को उसके यथार्थ स्वरूप में देखना मन के लिए उतना आकर्षक नहीं होता, क्योंकि उसमें कल्पना का रस नहीं होता, उसमें वह मिठास नहीं होती जो मन को लुभा सके। इसलिए मन वस्तु को वैसा नहीं देखना चाहता जैसा कि वह वास्तविक रूप में है, बल्कि वैसा देखना चाहता है जैसा उसे देखकर वह स्वयं को अधिक प्रसन्न, अधिक सुरक्षित, या अधिक अर्थपूर्ण अनुभव कर सके। 

यहाँ उपनिषद एक और गहरा आयाम जोड़ते हैं—अविद्या का। अविद्या केवल ज्ञान का अभाव नहीं है, बल्कि गलत ज्ञान का स्थायी हो जाना है। जब यह विपर्यय बार-बार दोहराया जाता है, तो वह केवल एक क्षणिक भ्रम नहीं रहता, बल्कि हमारी दृष्टि का स्वभाव बन जाता है। हम फिर हर वस्तु को उसी विकृत दृष्टि से देखने लगते हैं, और यही हमारे अनुभवों की दुनिया को निर्मित करता है।

इस प्रकार, विपर्यय व मिथ्या ज्ञान कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि एक आंतरिक प्रक्रिया है—जहाँ मन वस्तु से अधिक अपने सुख, अपने भय, अपनी धारणाओं को महत्व देता है। और जब तक यह प्रवृत्ति बनी रहती है, तब तक सत्य का अनुभव संभव नहीं हो पाता, क्योंकि हम वस्तु को नहीं, अपने ही मन के प्रतिबिंब को देख रहे होते हैं।

उपनिषद अंततः हमें इसी बिंदु पर लाकर खड़ा करते हैं—क्या हम वस्तु को वैसे देख सकते हैं जैसे वह है, बिना किसी आरोपण के? क्या हम उस दृष्टि तक पहुँच सकते हैं जहाँ न भय हो, न आकर्षण, न कल्पना—केवल देखना हो? 

यही प्रश्न वास्तव में साधना का आरंभ है। क्योंकि जब देखने की यह शुद्धता आती है, तब न केवल वस्तु स्पष्ट होती है, बल्कि देखने वाला भी अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होने लगता है। और वहीं, विपर्यय का अंत होता है—और सत्य का आरंभ।

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