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मन अपने ही रचे पात्रों से कैसे थकता है

1 week ago By Yogi Anoop

मन अपने ही रचे पात्रों से कैसे थकता है

कल्पनात्मक मन स्वयं को अनेक पात्रों में ढालने की आदत ही तो बना लेता है। उसे यह ज्ञान नहीं होता कि वह स्वयं को कितने रूपों में रच रहा है।

अपने भीतर देखो। क्या कभी आँख बंद करके आप स्वयं को केवल अकेला पाते हो? या मन ही मन किसी न किसी से बातें करते रहते हो?

सत्य यह है कि जिससे आप बातें करते रहते हो, वह कोई अन्य नहीं होता। वह तो स्वयं आप ही होते हो। यहाँ तक कि जब आप किसी कल्पना की रचना करते हो, तब भी उसमें जिससे प्रश्न और उत्तर का आदान-प्रदान करते हो, वह आप ही होते हो।

आँखें बंद करके जब आप प्रार्थना करते हो, तब भी यही होता है। प्रार्थना करने वाला भी आप, और उत्तर देने वाला भी आप। जिस रूप से प्रार्थना कर रहे हो, वह चित्र भी तो आप ही ने मन ही मन बनाया है। रचने वाला भी आप। रचा हुआ भी आप। यहाँ तक बात सरल लगती है। पर इसके आगे एक बात और है, जिस पर हम प्रायः ध्यान नहीं देते। हर रचना में श्रम लगता है।

जब मन किसी पात्र को गढ़ता है, तो वह केवल एक चित्र नहीं बनाता। वह उसकी आवाज़ बनाता है। उसके शब्द बनाता है। उसका स्वभाव, उसकी प्रतिक्रिया, उसका उत्तर, सब बनाता है। फिर उसी पात्र के सामने स्वयं खड़ा होकर बोलता है, सुनता है, प्रसन्न होता है, आहत होता है। एक ही मन, एक ही क्षण में, लेखक भी है, अभिनेता भी, दर्शक भी और समीक्षक भी। सोचो, यह कितना बड़ा परिश्रम है। और यह परिश्रम दिन में एक बार नहीं होता। यह लगभग हर क्षण चलता रहता है।

आप सोचते हो कि आप बैठे हैं, विश्राम में हैं। पर भीतर रंगमंच सजा हुआ है। कहीं कोई पुरानी बात दोहराई जा रही है। कहीं किसी से कल्पित विवाद चल रहा है। कहीं कोई भविष्य की बैठक अभी से खेली जा रही है। कहीं कोई ऐसा प्रश्न पूछ रहा है जिसका उत्तर भी भीतर से ही आ रहा है। शरीर कुर्सी पर है, पर मन किसी नाटक के पाँच अंकों में दौड़ रहा है।

इसीलिए तो मन थकता है। यह थकान काम की थकान से भिन्न है। काम की थकान के बाद विश्राम मिलता है। पर इस थकान में विश्राम की बारी ही नहीं आती, क्योंकि रंगमंच कभी बंद होता ही नहीं। रात को बिस्तर पर लेटते ही परदा फिर उठ जाता है। नींद आती भी है तो हल्की, टूटी हुई। सुबह उठकर लगता है कि रात भर कोई काम करते रहे। और सच यही है। मन रात भर काम ही करता रहा।

अब देह की बात करें। मन और देह दो अलग-अलग कमरे नहीं हैं। सांख्य की दृष्टि में जो प्रकृति मन में रजस् बनकर दौड़ती है, वही देह में वात बनकर बिखरती है। मेरे अनुभव में यह बात बार-बार दिखी है कि मन जिस पात्र से बात कर रहा हो, देह उसे वास्तविक मानकर ही उत्तर देती है। कल्पित विवाद में भी भौंहें तन जाती हैं। जबड़ा कस जाता है। कंधे ऊपर चढ़ जाते हैं। साँस उथली होकर छाती तक ही सिमट जाती है। हृदय की गति बढ़ जाती है। तंत्रिका तंत्र का वह भाग जो संकट के समय सक्रिय होता है, वह उस घटना के लिए भी सक्रिय हो जाता है जो घटी ही नहीं है। देह को कौन बताए कि यह केवल चित्र है।

अब सोचो, यह एक बार नहीं होता। यह दिन में सैकड़ों बार होता है, महीनों और वर्षों तक होता है। बंद आँखों के भीतर भी आँखें तनी रहती हैं, क्योंकि वे उस कल्पित दृश्य को देख रही होती हैं। माथा और गर्दन कसी रहती है। पेट की वह अग्नि, जिसे अन्न पचाना है, वह भोजन के समय भी किसी कल्पित संवाद में उलझी रहती है, और अन्न ठीक से पचता नहीं। हृदय को बिना कारण अतिरिक्त काम करना पड़ता है। नींद वह काम नहीं कर पाती जो उसे करना था, यानी देह की मरम्मत।

जब कोई अंग बार-बार बिना आवश्यकता के तनाव में रखा जाता है, तो वह धीरे-धीरे थकता है। थका हुआ अंग अपना काम ठीक से नहीं कर पाता। और जहाँ काम ठीक से नहीं होता, वहीं असंतुलन जन्म लेता है। इसी क्रम में अम्लता, सिर का भारीपन, नींद की कमी, रक्तचाप का उतार-चढ़ाव, पेशियों की जकड़न और अनजानी बेचैनी जैसी स्थितियों की संभावना बढ़ती जाती है। मैं यह नहीं कहता कि हर रोग का कारण यही है। पर इतना अवश्य कहता हूँ कि जो मन अपने ही रचे पात्रों से दिन-रात जूझता रहे, उसकी देह को रोग के लिए भूमि तैयार मिलती है। रोग हो, तो चिकित्सक की सहायता अवश्य लो। पर साथ ही यह भी देखो कि भीतर का रंगमंच कितना चल रहा है।

यहीं पतंजलि का सूत्र अर्थपूर्ण हो उठता है। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्। जब चित्त की वृत्तियाँ थमती हैं, तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। पर यह थमना बलपूर्वक नहीं होता। जिसे लड़कर रोकोगे, वह भी एक नया पात्र बन जाएगा, रोकने वाला पात्र। थमना तब होता है जब ज्ञान हो जाता है कि जाल बुनने वाला भी मैं, जाल में फँसा भी मैं।

जिस पल यह ज्ञान हो जाता है कि इन सबके कर्ता आप ही हैं, उसी क्षण आप अकर्ता में स्थित हो जाते हो।

फिर कोई पात्र गढ़ना नहीं पड़ता। फिर किसी से बात करनी नहीं पड़ती। जो ऊर्जा रंगमंच में खप रही थी, वह लौट आती है। साँस गहरी होती है। देह ढीली होती है। मन को पहली बार विश्राम मिलता है।

रचना बंद हुई, तो थकान भी बंद हुई। जो रचता था, वही अब विश्राम में है।


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