खिंचाव और शिथिलता का सिद्धांत
“उतना ही खिंचाव उचित है, जिससे मांसपेशियाँ बिना किसी प्रयास के अपनी मूल स्थिति में लौट आएँ।”
यह केवल एक शारीरिक नियम नहीं, अपितु एक गहरा जैविक और दार्शनिक सिद्धांत है।
एक प्रत्यक्ष प्रयोग — योगी अनूप का स्वानुभव : यह सिद्धांत केवल बौद्धिक चिंतन का परिणाम नहीं है। इसके पीछे एक दीर्घ और कठिन व्यक्तिगत अनुभव है।
योगी अनूप ने लगभग पाँच वर्षों तक अपनी देह पर एक विशेष प्रयोग किया — जिसमें मांसपेशियों के खिंचाव पर अत्यधिक बल दिया गया और शिथिलता को गौण रखा गया। इस प्रयोग में एक एक आसन में रोकने की क्षमता का बहुत तीव्र विकास किया गया । एक एक आसन की 5-10 मिनट तक रोका गया — यह उस समय की प्रचलित साधना-पद्धति के अनुसरण का स्वाभाविक परिणाम था।
किंतु कुछ वर्षों के पश्चात् देह और मन में जो लक्षण प्रकट हुए, वे इस सिद्धांत के जीवंत प्रमाण बन गए —
-मूड स्विंग्स — बिना किसी बाह्य कारण के मन का अस्थिर होना ।
-सिर में स्थायी भारीपन और दर्द — जो विश्राम के बाद भी नहीं जाता था ।
- देह में कहीं न कहीं खिंचाव का बने रहना — जैसे मांसपेशियाँ शिथिल होना भूल ही गई हों ।
- छाती में एक अकारण भय का स्थायी वास — जो न किसी घटना से जुड़ा था, न किसी विचार से ।
-गंधहीन डकार का निरंतर आते रहना । खाने का बहुत शीघ्रता से पच जाना ।
ये लक्षण पृथक-पृथक नहीं थे। ये सब एक ही मूल असंतुलन की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ थीं — खिंचाव के संस्कार का मन और देह में इतना गहरा बैठ जाना कि शिथिलता एक अपरिचित अवस्था हो गई।
इसी अनुभव ने योगी अनूप को उस सिद्धांत की ओर ले जाया जो यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
खिंचाव की अति और उसका शरीर पर प्रभाव
जब मांसपेशियों को आवश्यकता से अधिक खिंचाव दिया जाता है और उन्हें पर्याप्त शिथिलता का अवसर नहीं मिलता, तो एक विकृत चक्र आरंभ होता है। मांसपेशियाँ धीरे-धीरे खिंचाव को ही अपनी स्वाभाविक अवस्था मान लेती हैं और शिथिलता की उपेक्षा करने लगती हैं। जो अवस्था कभी असाधारण थी, वह अभ्यास के बल पर सामान्य बन जाती है — और इसी में रोग का बीज छिपा होता है।
आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान इसे maladaptive neuromuscular patterning कहता है — अर्थात् तंत्रिका तंत्र एक विकृत पैटर्न को ही सामान्य मान लेता है।
मन और मांसपेशियों की सहभागिता यहाँ एक सूक्ष्म और महत्त्वपूर्ण तथ्य है — मांसपेशियाँ स्वयं निर्णय नहीं करतीं। वे मन के संकेतों पर चलती हैं।
जब मन खिंचाव से आनंद और उत्तेजना ग्रहण करने लगता है, और शिथिलता के प्रति उदासीन हो जाता है, तो उसके द्वारा संचालित मांसपेशियों में भी वही स्वभाव धीरे-धीरे जागृत होने लगता है। यह एक mind-muscle feedback loop है — जहाँ मन और देह एक-दूसरे को उसी विकृत दिशा में और गहरे ले जाते हैं। जहाँ तक भारतीय दर्शन की बात है उसमें इसे एक विशेष संस्कार का निर्माण कहते हैं — चित्त में तनाव का संस्कार इतना प्रबल हो जाता है कि शिथिलता का अनुभव असह्य या अर्थहीन लगने लगता है। इसीलिए चित्त में राजसिक वृत्तियों को न डालने की बात की गई । राजसिक वृत्तियों का अभिप्राय है ऐसी वृत्तियाँ जो तनाव को अधिक महत्व देती अहीन । मन और इन्द्रियों को उग्र बनाती हैं ।
दीर्घकालिक परिणाम — मन, देह और ग्रंथियाँ कुछ वर्षों के ऐसे अभ्यास के पश्चात् यह असंतुलन केवल मांसपेशियों तक सीमित नहीं रहता। मन स्थायी रूप से खिंचाव और उत्तेजना की ओर आकर्षित हो जाता है। विश्राम, मौन और सहजता से वह कटने लगता है। यहीं से मानसिक अस्त-व्यस्तता, बेचैनी और असंतुलन की जड़ें जमती हैं। इससे भी सूक्ष्म स्तर पर — अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (endocrine glands) भी इसी विकृत संकेत को ग्रहण करती हैं और रसों (hormones) के स्राव में अति करने लगती हैं। कॉर्टिसोल, एड्रेनालिन जैसे तनाव-हार्मोन का असंतुलन इसी प्रक्रिया का जैविक प्रमाण है। कभी ज़्यादा रसों का स्राव शुरू होता है और कभी कम होने लगता है । जब कम स्राव होता है तब वह पुनः खिंचाव की ओर अपने को प्रेरित करता है अर्थात् मांसपेशियों में खिंचाव करने के लिए कुछ न कुछ अभ्यास करने लगता है । जैसे बहुत सारे लोग जैसे ही ग्रंथियाँ स्राव कम करती हैं वे जिम में अभ्यास करना शुरू कर देते हैं , उससे उनके अंदर संतुलन का अनुभव आने लगता है । किंतु यह एक चक्र बन जाता है । परिणामस्वरूप मानसिक अस्त-व्यस्तताएँ स्वाभाविक रूप से आ ही जाती हैं — चिंता, अनिद्रा, क्रोध, अस्थिरता — वे प्रायः इसी असंतुलन की परिणति हैं।
इसीलिए चाहे वह योगी अनूप द्वारा किए गए योग में प्रयोग हो अथवा जिम में किए गए अभ्यास से हो , दोनों में यदि विश्राम को उपेक्षित किया गया तो समस्या का पैदा होना स्वाभाविक हो जाएगा । जिस भी अभ्यास में चाहे वह मन का हो , इन्द्रियों का हो व देह की मांसपेशियों का हो , यदि खिंचाव और भार को ही उपलब्धि माना जाता है, और विश्राम को आलस्य तो मन और देह का रोग निश्चित ही है । उसे रोकना संभव नहीं है । । दोनों ही स्थितियों में भविष्य में मन और देह की समस्याएँ बढ़ती ही हैं। सार खिंचाव और शिथिलता का संतुलन ही स्वास्थ्य है। जो मांसपेशी खिंचाव के बाद सहज शिथिल हो सके — वही स्वस्थ है। जो मन उत्तेजना के बाद सहज विश्राम में लौट सके — वही संतुलित है। और जो ग्रंथियाँ आवश्यकतानुसार स्रवित हों, न अधिक न न्यून — वही जीवन का आधार हैं। यही प्रकृति का नियम है। यही योग का मूल है।
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